Saturday, November 7, 2009

आपके विचार

आपके विचार से कन्या के साथ दान की बात करना कहाँ तक उचित है
दहेज की बारात / काका हाथरसी
जा दिन एक बारात को मिल्यौ निमंत्रण-पत्रफूले-फूले हम फिरें, यत्र-तत्र-सर्वत्रयत्र-तत्र-सर्वत्र, फरकती बोटी-बोटीबा दिन अच्छी नाहिं लगी अपने घर रोटीकहँ 'काका' कविराय, लार म्हौंड़े सों टपकेकर लड़ुअन की याद, जीभ स्याँपन सी लपकेमारग में जब है गई अपनी मोटर फ़ेलदौरे स्टेशन, लई तीन बजे की रेलतीन बजे की रेल, मच रही धक्कम-धक्कादो मोटे गिर परे, पिच गये पतरे कक्काकहँ 'काका' कविराय, पटक दूल्हा ने खाईपंडितजू रह गये, चढ़ि गयौ ननुआ नाईनीचे को करि थूथरौ, ऊपर को करि पीठमुर्गा बनि बैठे हमहुँ, मिली न कोऊ सीटमिली न कोऊ सीट, भीर में बनिगौ भुरताफारि लै गयौ कोउ हमारो आधौ कुर्ताकहँ 'काका' कविराय, परिस्थिति विकट हमारीपंडितजी रहि गये, उन्हीं पे 'टिकस' हमारीफक्क-फक्क गाड़ी चलै, धक्क-धक्क जिय होयएक पन्हैया रह गई, एक गई कहुँ खोयएक गई कहुँ खोय, तबहिं घुस आयौ टी-टीमांगन लाग्यौ टिकस, रेल ने मारी सीटीकहँ 'काका', समझायौ पर नहिं मान्यौ भैयाछीन लै गयौ, तेरह आना तीन रुपैयाजनमासे में मच रह्यौ, ठंडाई को सोरमिर्च और सक्कर दई, सपरेटा में घोरसपरेटा में घोर, बराती करते हुल्लड़स्वादि-स्वादि में खेंचि गये हम बारह कुल्हड़कहँ 'काका' कविराय, पेट हो गयौ नगाड़ौनिकरौसी के समय हमें चढ़ि आयौ जाड़ौबेटावारे ने कही, यही हमारी टेकदरबज्जे पे ले लऊँ नगद पाँच सौ एकनगद पाँच सौ एक, परेंगी तब ही भाँवरदूल्हा करिदौ बंद, दई भीतर सौं साँकरकहँ 'काका' कवि, समधी डोलें रूसे-रूसेअर्धरात्रि है गई, पेट में कूदें मूसेबेटीवारे ने बहुत जोरे उनके हाथपर बेटा के बाप ने सुनी न कोऊ बातसुनी न कोऊ बात, बराती डोलें भूखेपूरी-लड़ुआ छोड़, चना हू मिले न सूखेकहँ 'काका' कविराय, जान आफत में आईजम की भैन बरात, कहावत ठीक बनाईसमधी-समधी लड़ि परै, तै न भई कछु बातचलै घरात-बरात में थप्पड़- घूँसा-लातथप्पड़- घूँसा-लात, तमासौ देखें नारीदेख जंग को दृश्य, कँपकँपी बँधी हमारीकहँ 'काका' कवि, बाँध बिस्तरा भाजे घर कोपीछे सब चल दिये, संग में लैकें वर कोमार भातई पै परी, बनिगौ वाको भातबिना बहू के गाम कों, आई लौट बरातआई लौट बरात, परि गयौ फंदा भारीदरबज्जै पै खड़ीं, बरातिन की घरवारींकहँ काकी ललकार, लौटकें वापिस जाऔबिना बहू के घर में कोऊ घुसन न पाऔहाथ जोरि माँगी क्षमा, नीची करकें मोंछकाकी ने पुचकारिकें, आँसू दीन्हें पोंछआँसू दीन्हें पोंछ, कसम बाबा की खाईजब तक जीऊँ, बरात न जाऊँ रामदुहाईकहँ 'काका' कविराय, अरे वो बेटावारेअब तो दै दै, टी-टी वारे दाम हमारे

कन्यादान - ऋतुराज (कवि)

कितना प्रमाणिक था उसका दुःख
लड़की को दान में देते वक्त
जैसे वही उसकी अन्तिम पूंजी हो

लड़की अभी सयानी नहीं थी
अभी इतनी भोली सरल थी
कि उसे सुख का आभास तो होता था
लेकिन दुःख बांचना नहीं आता था
पाठिका थी वह धुंधले प्रकाश की
कुछ तुकों और कुछ लयबद्ध पंक्तियों की

माँ ने कहा पानी में झांककर
अपने चेहरे पर मत रीझना
आग रोटियां सेंकने के लिए है
जलने के लिए नहीं
वस्त्र और आभूषण शाब्दिक भ्रमों की तरह
बंधन है स्त्री जीवन के

माँ ने कहा लड़की होना
पर लड़की जैसी दिखाई मत देना ।